समानता का अधिकार (अनु. 14 से 18)  

Dec 11, 2025 - 14:31
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समानता का अधिकार (अनु. 14 से 18)  

Right to Equality (Articles 14 to 18)

 

अनुच्‍छेद 14: विधि के समक्ष समानता व विधि का समान संरक्षण।

 

विधि के समक्ष समानता: यह ब्रिटेन से लिया गया है जिसका तात्‍पर्य है कि कोई भी व्‍यक्ति कानून के ऊपर नहीं है तथा राज्‍य सभी व्‍यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा और उसे सभी पर एक समान रूप से लागू करेगा।

 Equality before law: It is derived from Britain which means that no person is above the law and the state will make uniform laws for all persons and will apply them equally to all.

विधि का समान संरक्षण- यह अमेरिका से लिया गया है जिसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों में पाए जाने वाले व्‍यक्तियों को समान संरक्षण प्रदान किया जाएगा।

Equal protection of the law – This is taken from America which means that persons found in similar circumstances will be provided equal protection.

विधि का शासन: इसे ब्रिटिश कानून विशेषक A.V. dicecy द्वारा दिया गया तथा भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अनु. 14 के तहत विधि का शासन को संविधान का मूल तत्‍व कहा है अर्थात् संशोधन के द्वारा भी संसद इसे समाप्‍त नहीं कर सकती।

 Rule of Law: This was coined by British legal expert A.V. Dicey and the Supreme Court of India has declared the rule of law as a fundamental element of the Constitution under Article 14, meaning that Parliament cannot abolish it even through amendment.

अनुच्‍छेद 15(1): धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्‍मस्‍थान के आधार पर भेदभाव निषेध है इसका अर्थ है कि राज्‍य इन 5 आधारों पर भेदभाव नहीं कर सकता।

 Article 15(1): Discrimination on grounds of religion, race, caste, sex or place of birth is prohibited. It means that the state cannot discriminate on these 5 grounds.

अनुच्‍छेद 15(2): राज्‍य के साथ-साथ प्राइवेट कंपनी या संस्‍था दुकानों सार्वजनिक स्‍थानों होटल मनोरंजन के स्‍थल कुओं तालाब आदि किसी भी स्‍थान पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

अनुच्‍छेद 15(3)- राज्‍य महिलाओं एवं बच्‍चों के लिए विशेष प्रावधान करती है और इसे लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं माना जायेगा।

जेसे: महिलाओं को दिया जाने वाला मातृत्‍व अवकाश।

अनुच्‍छेद 15(4) : इसे पहले संविधान संशोधन 1951 के द्वारा जोड़ा गया जिसके अनुसार राज्‍य सामाजिक व शैक्षिणक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है इसे जाति के आधार पर भेदभाव नहीं माना जायेगा।

अनुच्‍छेद 15(5) :- 93वें संविधान संशोधन, 2005 के द्वारा इसे जोड़ा गया जो किसी भी शैक्षणिक संस्‍थान में पिछड़े वर्गो से प्रावधान में संबंधित है।

अनुच्‍छेद 15(6):- 103वें संविधान संशोधन 2019 के द्वारा जोड़ा गया है जिसके अनुसार राज्‍य आर्थिक पिछड़ा वर्ग के लिए विशेष प्रावधान जोड़ा गया।  अनुच्छेद 16 की धाराएँ (Clauses):

अनुच्‍छेद 16(1):

 

प्रत्येक नागरिक को राज्य के स्वामित्व वाले किसी भी पद पर फिल्म के संबंध में समान अवसर का अधिकार होगा।

(सार्वजनिक रोजगार में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर)

 

अनुच्‍छेद 16(2):

 

किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, वंश, लिंग, जन्म स्थान, निवास आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।

 No citizen shall be discriminated against on grounds only of religion, caste, descent, sex, place of birth, residence etc.

 (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान या निवास के आधार पर सरकारी नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं)

(No discrimination in government employment on the grounds of religion, race, caste, sex, descent, place of birth or residence)

 

अनुच्‍छेद 16(3):

 

संसद में कुछ स्थायी निवासियों के लिए निवास (निवास) के लिए उपयुक्त कानून बनाया जा सकता है।

 Parliament may enact appropriate legislation providing for residency for certain permanent residents.

 (उदाहरणार्थ, कुछ राज्यों को स्थानीय निवास स्थान देते हैं)

 (For example, some states grant local residency.)

अनुच्‍छेद 17:- अस्‍पृश्‍यता का अंत

 

इस अनुच्‍छेद के द्वारा अस्‍पृश्‍यता के उन्‍मूलन के लिए उसे दण्‍डनीय अपराध घोषित किया गया है और उसके लिए कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है न कि राज्‍य विधानमण्‍डल के पास। संसद ने अपृश्‍यता अपराध अधिनियम 1955 पारित किया और 1976 में इसका नाम बदलकर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 कर दिया गया। इस अधिनियम के तहत SC,ST अत्‍याचार निवारण नियम 1995 को लागू किया गया है।

 This article declares untouchability a punishable offense and empowers Parliament, not state legislatures, to legislate for its abolition. Parliament passed the Untouchability Offences Act, 1955, which was renamed the Protection of Civil Rights Act, 1955, in 1976. The SC/ST (Prevention of Atrocities) Rules, 1995, are enacted under this Act.

अस्‍पृश्‍यता शब्‍द को न तो संविधान और न ही अधिनियम में परिभाषित किया गया है।  

The term untouchability is neither defined in the Constitution nor in the Act.

अनुच्‍छेद 18:- उपाधियों का अंत

 Article 18: Abolition of titles

è      राज्‍य, सेना या शिक्षा संबंधी सम्‍मान को छोड़कर कोई अन्‍य उपाधि प्रदान नहीं करेगा।

è      The State shall not confer any title other than military or academic honours.

è      भारत का कोई भी नागरिक किसी भी अन्‍य देश से बिना राष्‍ट्रपति की आज्ञा के कोई भी उपाधि स्‍वीकार नहीं करेगा।

è       No citizen of India shall accept any title from any other country without the permission of the President.

è      1954 से भारत में पद्म विभूषण, भारत रत्‍न, पद्म भूषण आदि उपाधियों को देना प्रारंभ किया गया जिसे 1977 में जनता पार्टी सरकार न देना बंद कर दिया किंतु 1980 में इन्‍हें फिर से देना प्रारंभ कर दिया गया।

è       From 1954, titles like Padma Vibhushan, Bharat Ratna, Padma Bhushan etc. were started being given in India, which were stopped by the Janata Party government in 1977, but they were started being given again in 1980.

è      SC ने इन्‍हें पुरस्‍कार माना है न कि उपाधि।

è      SC has considered these as awards and not titles.

è      पुरस्‍कार प्राप्‍त व्‍यक्ति को अपने नाम के आगे या पीछे कोई भी टाइटल के प्रयोग की अनुमति नहीं है।  

è      The awardee is not permitted to use any title before or after his/her name.